Uttarakhand

ब्लैक टॉप पर पहुंचने में स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की अहम भूमिका

देहरादून । पूर्वी लद्दाख में पैगोंग झील के किनारे की रणनीतिक चोटी ब्लैक टॉप पर भारतीय सेना के पहुंचने में स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) की अहम भूमिका रही। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के पराक्रम और भारतीय सेना के जज्बे का ही नतीजा है कि ड्रैगन के पांव यहां टिक नहीं सके। एसएफएफ को दुश्मन के इलाके में तेजी से वार करने में माहिर माना जाता है। इस फोर्स को गुरिल्ला युद्ध में महारथ है। 

वर्ष 1962 में चीन से जंग के बाद यह फोर्स वजूद में आई थी। शुरू में इसमें 5,000 जवान थे, इन्हें प्रशिक्षण देने के लिए सरकार ने देहरादून में 22 वां प्रतिष्ठान (टूटू इस्टैब्लिशमेंट) की स्थापना की। शुरुआती चरण में इस फोर्स में तिब्बती युवाओं को भर्ती करने की व्यवस्था थी, लेकिन बाद में गोरखा मूल के जवान भी शामिल कर लिए गए। वर्तमान में फोर्स में भारतीय सेना के अफसर और तिब्बती व गोरखा मूल के जवान हैं। इन जवानों को अलग-अलग स्थान पर स्पेशल कमांडो ट्रेनिंग और अन्य विशेष प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है। खासकर, ऊंचे शिखरों पर पराक्रम दिखाने के लिए इन्हें विशेष तौर पर तैयार किया जाता है। इस फोर्स की गतिविधियां गोपनीय रखी जाती हैं।

विभिन्न मोर्चों पर मनवाया लोहा 

वर्ष 1971 में बांग्लादेश युद्ध के समय मोर्चे पर तैनात इस फोर्स के जवानों ने स्पेशल ऑपरेशन को अंजाम देकर अपनी वीरता का परचम लहराया है। इस जंग में चटगांव के पहाडिय़ों को ‘ऑपरेशन ईगल’ के तहत सुरक्षित करने में एसएफएफ का अहम रोल था। इस दौरान फोर्स के कई जवानों को शहादत देनी पड़ी। इसके अलावा ऑपरेशन ब्लू स्टार में भी इसके कमांडोज शामिल थे। कारगिल युद्ध व मुंबई में हुई आतंकी घटना के समय भी इसने अहम जिम्मेदारी निभाई है।  वहीं, सियाचिन की चोटियों पर जब भारत ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ लॉन्च करने का फैसला किया तो भी एसएफएफ को याद किया गया। एलएसी पर चल रहे चीन से सीमा विवाद के चलते स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की तैनाती की गई है। 

इस्टैब्लिशमेंट 22 क्यों

मेजर जनरल (रिटायर्ड) सुजन सिंह पेशल फ्रंटियर फोर्स के पहले इंस्पेक्टर जनरल थे। वह दूसरे विश्वयुद्ध में 22 माउंटेन रेजिमेंट के कमांडर थे। उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था और ब्रिटिश भारतीय सेना में उनका अच्छा-खासा कद था।